देश में ही अलग-अलग हैं होली के रंग, रंग हैं हजार और हर रंग में बरसता है प्यार,

पुराने काल में पानी को केसर, प्लास आदि फूलों से रंगीन और सुवासित बना कर रंग खेला जाता था पर आज हानिकारक रसायनिक रंगों का प्रचलन है. (फोटो साभार इंस्टाग्राम)
पुराने काल में पानी को केसर, प्लास आदि फूलों से रंगीन और सुवासित बना कर रंग खेला जाता था पर आज हानिकारक रसायनिक रंगों का प्रचलन है. (फोटो साभार इंस्टाग्राम)

रंगों का त्योहार होली भारत भर में कई रूपों में इसलिए मनाया जाता है, क्योंकि इन सभी के साथ अपने-अपने आंचलिक नाम, और महत्ता जुड़ी हुई हैं. कहीं होली नववर्ष के शुभारंभ के उपलक्ष्य में मनाई जाती है तो कहीं इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के अमर-प्रेम को याद करते हैं. पुराने काल में पानी को केसर, प्लास आदि फूलों से रंगीन और सुवासित बना कर रंग खेला जाता था पर आज हानिकारक रसायनिक रंगों का प्रचलन है.

ब्रज बरसाने की लट्ठमार होली प्रसिद्ध है तो पंजाब का होला मोहल्ला एक खास अंदाज वाली होली है. वास्तव में यह होली के दिन से तीन दिन तक चलने वाला विशाल सामाजिक मिलन रूपी वार्षिक मेला होता है जो आनंदपुर साहिब में लगाया जाता है. दरअसल, इसे सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह ने शुरू किया था. इसका मुख्य उद्देश्य था सिख युवकों को शारीरिक स्तर पर मजबूत करना. मेले में दो घोड़ों पर सवारी सहित अनेक प्रकार के साहसिक कारनामे देखने को मिलते हैं. देश-विदेश से इस अद्वितीय मेले को देखने लाखों लोग आते हैं. अंतिम दिन शोभा यात्रा के साथ-साथ सामूहिक विवाह और गुरु के लंगर भी लगाए जाते हैं.

हिंदू कैलेंडर के अनुसार, फाल्गुन मास के अंत और चैत्रा मास की शुरुआत में होली मनाई जाती है. दरअसल, नव वर्ष, यानी संवत्सर अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग दिन मनाई जाती है. कुछ स्थानों पर फाल्गुन को वर्ष का अंतिम महीना और चैत्रा को वर्ष का नया महीना मानते हैं. बिहार में होलिका दहन को संवत्सर दहन भी कहा जाता है और चैत्रा की पहली तारीख को होली यानी नए साल के रूप में मनाया जाता है. बिहार में होली को फगुआ या फागुन पूर्णिमा भी कहा जाता है. फगु का अर्थ है लाल रंग और पूर्णिमा यानी पूरा चांद.

पुराने काल में पानी को केसर, प्लास आदि फूलों से रंगीन और सुवासित बना कर रंग खेला जाता था पर आज हानिकारक रसायनिक रंगों का प्रचलन है. (फोटो साभार इंस्टाग्राम)
पुराने काल में पानी को केसर, प्लास आदि फूलों से रंगीन और सुवासित बना कर रंग खेला जाता था पर आज हानिकारक रसायनिक रंगों का प्रचलन है. (फोटो साभार इंस्टाग्राम)

इस दिन हरियाणा में भाभियों की चांदी होती है. वे अपने देवर से वर्ष भर किए गए हंसी-मजाक का बदला लेती है. वे दिन भर साड़ी से लट्ठ तैयार कर उन्हें पीटने का उपक्रम करती रहती हैं. शाम में देवर अपनी भाभियों को उपहार में मिठाइयां देकर खुश करने की कोशिश करते हैं. साथ ही एक स्थान पर एकत्रित होकर युवक दही की मटकियां भी फोड़ते हैं. महाराष्ट्र के लोग होली को रंगपंचमी कहते हैं. यहां के स्थानीय लोग, खासकर मछुआरे शिमगो मनाते हैं. इस दिन लोग खूब नाचते, गाते और खुशियां मनाते हैं. नाच के दौरान लोग अपनी खुशियां और गम एक-दूसरे को बताकर बांटते हैं. अपने हाथ और मुंह के सहारे एक विचित्रा शैली में आवाज निकालना इस त्योहार की सबसे बड़ी खासियत है.

पश्चिम बंगाल में होली को दोल जात्रा भी कहा जाता है. इस दिन राधा और कृष्ण की मूर्ति को खूब सजा कर उनकी शोभा यात्रा निकाली जाती है. इस दौरान, स्त्रिायां भक्ति गीत गाती हैं और पुरुष रंग और गुलाल छिड़कते जाते हैं.

तमिलनाडु में कामदेव की पूजा की जाती है. प्रचलित कथाओं के अनुसार, भगवान शंकर के कोप के कारण कामदेव जल कर भस्म हो जाते हैं लेकिन बाद में उनकी पत्नी रति की प्रार्थना पर उन्हें जीवित भी कर देते हैं. तमिलनाडु में ऐसी मान्यता है कि होली के दिन ही कामदेव दोबारा जीवित होते हैं. इसलिए यहां के लोग गीतों के माध्यम से रति की व्यथा-कथा कहते हैं और कामदेव को जलन से मुक्ति दिलाने के लिए उन्हें चंदन अर्पित करते हैं.

उत्तरांचल में होली के गानों में लोक संगीत और शास्त्राीय संगीत को महत्व ज्यादा दिया जाता है. रंग खेला जाता है और लोग एक दूसरे से मिलने जाते हैं.

राजस्थान में भी उत्तर प्रदेश जैसी होली खेली जाती है. कहीं कहीं खून की होली भी खेलते हैं. एक दूसरे पर खून निकलने तक पत्थर फेंके जाते हैं. इस खून से तिलक किया जाता है. शाम को नए कपड़े पहनते हैं, गुलाल और अबीर का तिलक लगाया जाता है. बड़े छोटों को आशीष देते हैं.

मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ जिले में छोटे गाँवों में गोल बढ़ेदा नाम का त्योहार मनाया जाता है. नारियल और गुड़ की पोटली को ताड़ के ऊँचे पेड़ पर टाँग दिया जाता है. (फोटो साभार इंस्टाग्राम)
मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ जिले में छोटे गाँवों में गोल बढ़ेदा नाम का त्योहार मनाया जाता है. नारियल और गुड़ की पोटली को ताड़ के ऊँचे पेड़ पर टाँग दिया जाता है. (फोटो साभार इंस्टाग्राम)

मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ जिले में छोटे गाँवों में गोल बढ़ेदा नाम का त्योहार मनाया जाता है. नारियल और गुड़ की पोटली को ताड़ के ऊँचे पेड़ पर टाँग दिया जाता है. लड़कों में इस पेड़ पर चढ़कर पोटली उतारने की होड़ लगती है पर यह कोई आसान काम नहीं, क्योंकि उनका पेड़ पर चढ़ना और लड़कियों का किसी न किसी तरह उनका ध्यान अपनी ओर खींचना साथ-साथ शुरू हो जाता है. जो लड़का पोटली लाने में कामयाब हो जाता है उसे उन लड़कियों में से किसी को भी जीवनसाथी बनाने का हक दिया जाता है.

हिमाचल प्रदेश में सुजानपुर और पालनपुर में लगने वाले होली मेले में झांकियां निकाली जाती हैं. इन झांकियों के माध्यम से पौराणिक घटनाओं और क्षेत्रा की समृद्ध कला सम्पदा को प्रदर्शित किया जाता है. कुल्लू की होली जिसे फागली कहा जाता है, प्रसिद्ध है जहाँ अयोध्या से क्षेत्रा के आराध्य रघुनाथ भगवान जी की मूर्ति को प्राणप्रतिष्ठित किया गया है. एक सप्ताह पूर्व से ही बैरागी डफली और झांझ बजाते हुए घर- घर जाते हैं. पूरे शहर में घूम माचने के बाद ये लोग राजमहल पहुंचते हैं जहाँ उत्सव का समापन झंडे की लड़ाई से होता है. यहाँ होली की राख को जादुई माना जाता है. यहां के लोगों का विश्वास है कि इस राख को खेतों में फैलाने से दुर्घटना, दुर्भाग्य और संकट से बचाव होता है.

उत्तर भारत में मां अपनी ससुराल गई बेटी के लिए नए कपड़े बनवाती है. उन्हें खाने की दावत दी जाती है. दामाद को प्याला (प्यार और पैसों से भरा हुआ) देने का रिवाज है. वैसे ही बहू को कोथली याने यात्रा के लिए खर्चा देते हैं. बच्चों को बहला फुसलाकर दादा दादी उन्हें कमरे में बन्द कर देते हैं. बहू गाना गा कर प्रलोभन देती है और उन्हें छोड़ने की अर्ज करती है. प्रलोभन में हमेशा साड़ी या कोई गहने का लालच दिखाया जाता है.

महाराष्ट्र में होली के अवसर पर गोबर के उपले जलाने का रिवाज है. बाद में लकडि़याँ जलायी जाती हैं. (फोटो साभार इंस्टाग्राम)
महाराष्ट्र में होली के अवसर पर गोबर के उपले जलाने का रिवाज है. बाद में लकडि़याँ जलायी जाती हैं. (फोटो साभार इंस्टाग्राम)

महाराष्ट्र में होली के अवसर पर गोबर के उपले जलाने का रिवाज है. बाद में लकडि़याँ जलायी जाती हैं. इस दिन सुबह पूरणपोली का भोग लगाया जाता है और रात को उसे होली को अर्पित किया जाता है. गरमी के दिनों में आग लगने का संदेह ज्यादा होता है इसलिए अग्नि देवता को शांत करने के लिए यह पूर्णिमा मनायी जाती है. दूसरे दिन जहाँ होली जलाई गई है वहाँ बर्तन रख कर पानी गरम किया जाता है और इससे बच्चों को नहलाया जाता है ताकि आगे की आनेवाली गरमी की तकलीफ से उन्हें बचाया जा सके. यहाँ पूर्णिमा के बाद पंचमी को रंग खेला जाता है. थोड़ी गरमी शुरू हो जाने से उस दिन ठंडे पानी से होली खेलने का प्रारंभ करते हुए इस दिन के बाद ठंडे पानी से नहाना शुरू करते हैं.

डॉ. विनोद बब्बर

वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार.

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