नोटबंदी- GST पर भूल में विपक्ष, ‘मोदी विरोध’ ले ना डूबे कांग्रेस को..!

नोटबंदी और जीएसटी का फैसला हिम्मत भरा काम था. इसका विरोध भी कांग्रेस के विरोध में जा सकता है. (फोटो: bjp.org/inc.in)
नोटबंदी और जीएसटी का फैसला हिम्मत भरा काम था. इसका विरोध भी कांग्रेस के विरोध में जा सकता है. (फोटो: bjp.org/inc.in)

हमारे देश में हमेशा चुनावों का माहौल बना रहता है क्योंकि पूरा साल कहीं न कहीं चुनाव चल रहे होते हैं. पंचायत, नगरपालिका, विधानसभा और संसद का सदस्य बनने की लड़ाई लगातार चलती रहती है. शायद यही वजह है कि भारत में हर राजनीतिक दल चुनावी मूड में बना रहता है. सत्ता पक्ष के ज्यादातर निर्णय विभिन्न चुनावों पर होने वाले असर को देखते हुए किये जाते हैं और विपक्ष भी इन निर्णयों पर राजनीति करता रहता है.

हिम्मत का काम है नोटबंदी और जीएसटी का फैसला
मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार के खात्मे और आर्थिक सुधारों की दिशा में कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाये हैं जिसमें से नोटबन्दी और जीएसटी पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है. जहां तक सरकार का सवाल है, सरकार इन्हें भ्रष्टाचार को खत्म करने की दिशा में सबसे बड़ा कदम मानती है, लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष इन्हें सरकार की सबसे बड़ी विफलता साबित करने में लगा हुआ है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन निर्णयों से जनता को परेशानियों का सामना करना पड़ा है और यही वजह है कि विपक्ष इन निर्णयों के सहारे सरकार पर हावी होने की कोशिश कर रहा है. लेकिन इसका ज्यादा विरोध कहीं कांग्रेस सहित पूरे विपक्ष को महंगा ना पड़ जाए. 

वास्तव में मोदी सरकार की प्रशंसा इस आधार पर होनी चाहिए कि हमेशा चुनावी मूड में रहने वाले देश में लम्बी अवधि में असर दिखाने वाले जीएसटी,नोटबन्दी और आधारभूत ढांचे में सुधार जैसे फैसले लेने की हिम्मत उसने दिखाई है. सड़कों के निर्माण में लाखों करोड़ लगाने के बावजूद जनता से अच्छी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं की जा सकती है. इसी प्रकार जीएसटी का अच्छा असर दो साल से पहले दिखाई नहीं देगा और नोटबन्दी का असर दिखाया ही नहीं जा सकता. भाजपा के लिए संतोष की बात सिर्फ इतनी है कि जनता को मोदी पर इतना ज्यादा विश्वास है कि वो अभी तक इन फैसलों के साथ खड़ी दिखाई दे रही है.

ऐसे शुरू हो सकता है भाजपा का पतन?
जनता के भरोसे पर भरोसा करके ही मोदी जी ऐसे फैसले कर पाए हैं, लेकिन जब यह भरोसा टूटता दिखायी देगा तो भाजपा का पतन शुरू हो सकता है. वास्तव में विपक्ष इन निर्णयों को समझ रहा था, नोटबन्दी के विरोध का असर वो देख चुका था और जीएसटी तो कांग्रेस के दिमाग की ही उपज है लेकिन विपक्ष को भाजपा पर हावी होने का मौका भाजपा के ही किनारे लगाये गये नेताओं ने दिया है.

राहुल गांधी कहते हैं कि विकास पागल हो गया है क्योंकि वो मुख्य विपक्षी दल के कर्ताधर्ता है इसलिए उनकी बात हवा में नहीं उड़ानी जानी चाहिए. इस पर विचार करने की जरूरत है कि राहुल गांधी की नजर में विकास पागल क्यों हो गया है? यशवन्त सिंहा, शत्रुघ्न सिन्हा और अरूण शौरी की तिकड़ी भी यही बात कह रही है जो राहुल गांधी कह रहे हैं. वास्तव में विकास को पागल घोषित करने वाले राहुल गांधी नहीं बल्कि यही लोग हैं जिन्होंने अपनी ही पार्टी पर अपनी निजी खुन्दक निकाली और विपक्ष ने मामला उछाल दिया.

मोदी सरकार द्वारा इन लोगों को पूरी तरह से नजरंदाज कर दिया गया है और इसी वजह से इन्होंने आर्थिक व्यवस्था पर उंगली उठाई है. विपक्ष इनकी नकारात्मक राजनीति को अपना चुका है और सच्चाई देखने की जगह इन फैसलों की वजह से आई परेशानियों को लेकर इन फैसलों को ही गलत साबित करने पर तुला हुआ है. नकारात्मक राजनीति का स्तर इतना नीचे गिर गया है कि इन फैसलों को घोटाला बताया जा रहा है. वैसे यह भी सच है कि कांग्रेस अपने पिछले कार्यकाल में घोटाले ही करती रही, इसलिये उसे अब हर जगह घोटाले ही नजर आते हैं.

नोटबंदी-जीएसटी का विरोध महंगा ना पड़े विपक्ष को?
लगता है कि विपक्ष मोदी पर जनता के भरोसे को समझ नहीं पा रहा है और मोदी से मुकाबले के लिये नकारात्मक राजनीति का सहारा ले रहा है. नोटबन्दी से फायदा हुआ है या नहीं, जनता ये जानना ही नहीं चाहती बल्कि उसके लिये इतना ही काफी है कि एक व्यक्ति भ्रष्टाचारियों से लड़ने की हिम्मत दिखा रहा है. राहुल गांधी जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स की उपमा दे रहे हैं और उन्होंने कहा है कि जीएसटी का मतलब है, अपना पैसा मुझे दे दे. राहुल जानते हैं कि जीएसटी कांग्रेस का ही विचार है और मनमोहन सिंह चाहते थे कि जीएसटी लागू किया जाए, लेकिन इसके लिए वो हिम्मत नहीं जुटा पाए.

दरअसल, दुनिया के सैंकड़ों देश जीएसटी को अपना चुके हैं और बाकी बचे देश भी देर सवेर इसे अपने यहां लागू कर ही देंगे क्योंकि इसका मकसद ही है कि विभिन्न करों को समाप्त करके पूरे देश में एक कर लगाया जाए और जो लोग कर चोरी कर रहे हैं उन्हें किसी भी प्रकार कर के दायरे में लाया जाए. व्यापार को सुगम बनाने के लिए एक देश, एक टैक्स तथा करचोरी रोकने को आप गलत कैसे कह सकते हैं.

जीएसटी के बारे में ऐसे प्रचार किया जा रहा है जैसे सरकार ने जनता पर कोई नया टैक्स थोप दिया है जबकि यह सच्चाई सभी जानते हैं कि कई पुराने टैक्सों को खत्म करके नया टैक्स लगाया गया है. जिस प्रकार नोटबन्दी को लागू करने में सरकार ने गलतियां की थी, उसी प्रकार जीएसटी को लागू करने में सरकार की कुछ कमियां रह गई है, लेकिन सरकार जनता की परेशानियों को समझ रही है और उन्हें दूर करने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. विपक्ष जनता की परेशानियों को समझता है तो उसे इन परेशानियों को दूर करने में सरकार की मदद करनी चाहिए, लेकिन विपक्ष अपनी अलग ही ढपली बजाने में लगा हुआ है. विपक्ष की नकारात्मक राजनीति ही है जिसके कारण जीएसटी को ही गलत ठहराने की कोशिश की जा रही है.

विपक्ष की नकारात्मक राजनीति और कांग्रेस की गलती
राहुल से आप किसानों की समस्या पर बात करिये तो वो किसानों की सारी समस्याओं का एकमात्रा हल कर्जमाफी मानते हैं. उन्हें लगता है कि कर्जमाफी से किसान आत्महत्या करना बन्द कर देंगे जबकि सच्चाई यह है कि जहां-जहां कर्जमाफी की गई है वहां केवल कुछ दिनों के लिए ही आत्महत्याएं कम हुई हैं, लेकिन कुछ ही समय पश्चात उनमें दोबारा और तेजी आई है. किसानों की समस्याएं बेहद जटिल हैं. उनसे निबटने में सालों लगने वाले हैं क्योंकि इन्हें पैदा होने में भी सालों लगे हैं.

इस समय विपक्ष पूरी तरह से नकारात्मक राजनीति पर उतारू हो चुका है जबकि विपक्ष को सरकार की नीतियों के खिलाफ अपने कार्यक्रम को लाना चाहिये. उसे बताना चाहिये कि सरकार कहाँ गलत कर रही है और क्या करना चाहिये लेकिन विपक्ष तो सिर्फ गलतियां निकालने में लगा हुआ है. मैं अर्थशास्त्राी नहीं हूँ लेकिन मुझे समझ नहीं आता है कि जब रूपये की कीमत बढ़ रही है, शेयर बाजार आसमान छूने को लालायित है, महंगाई कम हो रही है तो सिर्फ जीडीपी में दो तिमाहियों की गिरावट को लेकर पूरी अर्थ व्यवस्था को बदहाल कैसे कहा जा सकता है. अर्थशास्त्राी भी कहते हैं कि जीएसटी लागू करने के बाद कुछ समय तक अर्थ व्यवस्था में गिरावट आती है तो विपक्ष को कुछ समय तक इन्तजार करना चाहिए.

ये कदम उठाना चाहिए विपक्ष को
विपक्ष का हक है कि वो सरकार की गलतियों के लिये उस पर निशाना लगाए, लेकिन देशहित में उठाये गये कदमों पर नुक्तचीनी करना तो ठीक नहीं है. विपक्ष की कई राज्यों में सरकार चल रही है और इन राज्यों की सरकारों ने जीएसटी में अपना योगदान दिया है फिर जीएसटी को लागू करने की जिम्मेदारी से विपक्ष क्यों भागना चाहता है. जीडीपी की गिरावट और बढ़ती बेरोजगारी के लिये सरकार को घेरना ठीक हो सकता है लेकिन आर्थिक सुधारों में रूकावट खड़ी करना देशहित में नहीं माना जायेगा. विपक्ष को नकारात्मक राजनीति छोड़कर अपने एजेंडे के साथ जनता के पास जाना चाहिए.

(इस लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं. India-reviews.com इसमें उल्लेखित बातों का न तो समर्थन करता है और न ही इसके पक्ष या विपक्ष में अपनी सहमति जाहिर करता है. यहां प्रकाशित होने वाले लेख और प्रकाशित व प्रसारित अन्य सामग्री से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. आप भी अपने विचार या प्रतिक्रिया हमें editorindiareviews@gmail.com पर भेज सकते हैं.)

सीमा पासी

पत्रकार और लेखक.

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