ये हैं दमा के शुरुआती लक्षण, एलोपेथी से नहीं ऐसे संभव है इलाज..!

सांस लेने में परेशानी, बेचैनी, और घुटन सा महसूस होना दमा के शुरुआती लक्षण हैं. (फोटो: Pixabay.com).
सांस लेने में परेशानी, बेचैनी, और घुटन सा महसूस होना दमा के शुरुआती लक्षण हैं. (फोटो: Pixabay.com).

दमा या श्वास रोग सांस संबंधी बीमारी है. इस रोग से ग्रसित व्यक्ति को सांस लेने और छोड़ने में कष्ट होता है. यह एक असाध्य रोग है. इसीलिए कहा जाता है कि दमा दम के साथ जाता है. यदि रोग के प्रारंभ में ही इसे दूर कर दिया जाए तो इस रोग से पीछा छूट सकता है लेकिन उचित उपचार नहीं कराने तथा पथ्य-परहेज में लापरवाही बरतने से रोग गले पड़ जाता है.

इस रोग में श्वास नलिकाओं में कफ के कारण रूकावट पैदा होती है. तब व्यक्ति को सांस लेने और छोड़ने में परेशानी होती है. सामान्य तौर पर सांस छोड़ते समय फेफड़ों के साथ समस्त श्वास नलिकाओं का आकुंचन होता है तभी अन्दर की वायु बाहर निकलती है. दमा के दौरे के समय श्वसन केंद्र पर लगातार झटके आते हैं जिससे आकुंचन क्रिया भी झटके से एवं गति के साथ होती है. फलतः रोगी को दौरे के समय काफी तकलीफ होती है.

आधुनिक चिकित्सा पद्धति ‘एलोपैथी’ में इसे असाध्य रोग माना जाता है लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा इस रोग को दूर किया जा सकता है. शरीर में रोग हमारी लापरवाही, खान-पान एवं संयम की त्रुटियों के कारण होता है. रोग ग्रस्त होते ही हम उससे छुटकारा पाने के लिए चिकित्सक की शरण में जाते हैं लेकिन धैर्य की कमी के कारण हम हिम्मत हार जाते हैं. हम बीमारी से और आगे के परिणामों से तो डरते हैं लेकिन स्वास्थ्य संबंधी नियमों की अवहेलना करने से बिल्कुल नहीं डरते, इसीलिए हम बीमार भी होते हैं.

कारण- वातावरण में मौजूद धूल- धुआं और कचरा आदि रोग का कारण बनते हैं. गले की सूजन, लम्बे समय तक सर्दी, खांसी, ब्रांकाइटिस या क्षय रोग के बाद श्वास रोग के होने की संभावना रहती है. आस-पास की हवा में मौजूद धूल कण व धुआं आदि हमारे श्वसन संस्थान को उत्तेजित करके दमा का दौरा लाते हैं. बीड़ी, सिगरेट, गांजा, भांग, तम्बाकू, अफीम, शराब आदि भी दमा के होने के महत्त्वपूर्ण कारण हैं. दमा का दौरा आने से पहले रोगी को सिर में भारीपन, घबराहट, बेचैनी नाक व गले में सुर-सुराहट, खराश, सूजन व बदन दर्द होने लगता है.

दमा का दौरा 5 मिनट से लेकर एक घंटे तक रहता है. उपचार देने पर थोड़ा कफ बाहर निकलकर रोगी को आराम मिलता है. दमा की सभी दवाओं में कुछ मात्रा विष की होती है जो रोगी को कुछ समय तक चमत्कारिक रूप से राहत पहुंचाती है. इसलिए कई रोगी दौरा आने से पहले ही दवा लेकर सो जाते हैं. दमा का दौरा बरसात के दिनों में ज्यादा पड़ता है. इसके अतिरिक्त मानसिक दुर्बलता, ज्ञान तंतु के कमजोर होने, दुखद प्रसंग आदि के कारण भी दमा का दौरा पड़ता है.

उपचार:- रोगी को अपने खान-पान का ध्यान रखना चाहिए. अल्प मात्रा में भोजन करना हितकर होता है. रोगी को ऐसा आहार लेना चाहिए ताकि कब्ज न होवे. अगर संभव हो तो समय समय पर एनिमा लेना चाहिए. इससे पेट साफ रहेगा. समशीतोष्ण जल टब स्नान से रोगी की लाभ मिलता है. टब स्नान से थके मांसपेशियों तथा ज्ञान तंतुओं का तनाव दूर होता है. रोगी के सिर पर ठंडे पानी की पट्टी बदल बदलकर रखना चाहिए. इससे शरीर के ऊपरी भाग, सिर व दोनों फेफड़ों की थकावट दूर होती है.

जब दमा का तीव्र दौरा पड़े तो रोगी का हाथ और पैर गरम पानी में डुबाना चाहिए. गर्म पानी में नीलगिरी का तेल मिलाकर नाक, गले और छाती में भाप देना चाहिए. इससे श्वास नलिकाएं फैल जाती हैं जिससे उसमें रूका हुआ कफ बाहर निकल आता है और रोगी को राहत मिलती है.

रोगी को 15-20 मिनट ही भाप देना चाहिए. इसके अलावा एक ठंडी चादर और तौलिया रोगी की छाती पर लपेटकर उसे लेटा देना चाहिए. छाती पर लपेट भी दमा के लिए उपयोगी उपचार है. दौरे के समय छाती पर गरम सेंक सर्वोत्तम उपचार है. इस तरीके से कमजोर रोगी का भी उपचार किया जा सकता है.

रोगी को समय-समय पर गरम पानी या गरम पेय अदरक, शहद, तुलसी का काढ़ा पीने के लिए दिया जाए. यदि रोगी के लिए नींबू अनुकूल हो तो इसे भी दिया जा सकता है. कच्चा साग, भाजी, सूप और मौसमी का रस भी दिया जा सकता है. रोगी को गरिष्ठ आहार से बचना चाहिए. गरिष्ठ आहार खाने से दौरा पड़ने की संभावना रहती है. तीव्र दौरे की स्थिति में कुछ दिनों तक उपवास कराना हितकर होता है.

पूर्ण लाभ होने पर एक वर्ष तक दमा का दौरा न पड़े तो रोगी को रोगमुक्त मानना चाहिए. रोगमुक्त होने के पश्चात् भी खान पान में सावधानी रखनी चाहिए. साथ ही धीरे-धीरे व्यायाम करने की आदत डालनी चाहिए. व्यायाम करने से फेफड़े मजबूत होंगे और पसीने के साथ शरीर के विजातीय पदार्थ बाहर निकल आएंगे. इस तरह से कोई भी रोगी सारी उम्र स्वस्थ जीवन जी सकता है.

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