गुजरात में लड़खड़ा रहा बीजेपी का कॉन्फिडेंस? पढ़ें ये रिपोर्ट..!

गुुुुजरात विधानसभा चुनाव 2017. बीजेपी गुजरात में आत्मविश्वास खो रही है?
गुुुुजरात विधानसभा चुनाव 2017. बीजेपी गुजरात में आत्मविश्वास खो रही है?

वैसे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह राज्य गुजरात होने के कारण विगत कई वर्षों से चर्चा के केन्द्र में रहा है, लेकिन तत्काल विधानसभा चुनाव की घोषणा ( 9 और 14 दिसंबर को दो चरणों में वोटिंग, 18 दिसंबर को नतीजे) के साथ ही यह एक बार फिर से सियासी चर्चाओं के केन्द्र में आ गया है. इस बार जो चर्चा हो रही है वह थोड़ी भिन्न है. भिन्न इस दृष्टि से कि चर्चा करने वाले इस बात पर भी गंभीरता से विचार कर रहे हैं कि आखिर प्रधानमंत्री खुद इस चुनाव में इतने सक्रिय क्यों हैं? 

दरअसल, पहले भी देश के राज्यों में चुनाव होते रहे हैं. स्वाभाविक रूप से अतीत में भी प्रधानमंत्री किसी न किसी प्रांत के ही होते रहे हैं, लेकिन जितनी सक्रियता के साथ वर्तमान प्रधानमंत्री, गुजरात चुनाव में अपने आप को संलग्न कर रहे हैं उतनी सक्रियता अन्य किसी प्रधानमंत्रियों में नहीं देखी गई. इस दृष्टि से भी यह चुनाव थोड़ा अलग दिखने लगा है. हालांकि आजकल प्रधानमंत्री यह बोलना बंद कर दिए हैं कि मैं दिल्ली के बाहर का हूं, लेकिन प्रधानमंत्री का यह पूर्वाग्रह आज भी कहीं न कहीं दिख जाता है. 

स्वतंत्र भारत के इतिहास में गुजरात ने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए हैं. गुलजारी लाल नंदा थोड़े दिनों के लिए ही प्रधानमंत्री बन पाए और कभी महत्वपूर्ण निर्णय लेने की स्थिति में नहीं रहे, लेकिन मोरारजी भाई देसाई तो लगभग ढाई साल तक देश का नेतृत्व किया और कई महत्वपूर्ण निर्णय आज भी उनके नाम हैं, लेकिन उन दोनों प्रधानमंत्रियों में गुजरात के प्रति इतना लगाव नहीं दिखा जितना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का गुजरात के प्रति देखा जा रहा है.

पीएम नरेंद्र मोदी के हाथ में प्रचार की कमान 
हालांकि भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री के उम्मीदवार घोषित होने के बाद से लेकर अब तक जितने भी चुनाव हुए हैं उन तमाम चुनावों में प्रचार का नेतृत्व नरेंद्र मोदी ही करते आए हैं, लेकिन इस बार प्रधानमंत्री केवल प्रचार ही नहीं कर रहे हैं, गुजरात से जो खबर आ रही है वह यह है कि गुजरात चुनाव प्रचार की पूरी कमान इस बार खुद प्रधानमंत्री संभाल रहे हैं. इस दृष्टि से भी यह चुनाव थोड़ा भिन्न है. इस चुनाव का परिणाम क्या होगा यह तो मतपत्रों की गणना के बाद ही पता चलेगा, लेकिन जो समीकरण सामने आ रहे हैं उसमें इस बार भाजपा कांग्रेस की तुलना में कमजोर पड़ रही है. यह बात इसलिए उठती है क्योंकि जिस प्रदेश में प्रधानमंत्री ने 12 साल बतौर मुख्यमंत्री राज किया उस प्रदेश में प्रधानमंत्री खुद पसीना बहा रहे हों तो यह समझ लेना चाहिए कि प्रदेश का मिजाज भाजपा के विमुख हो चुका है. 

गुजरात के राजनीतिक इतिहास पर नजर
यदि वाकई ऐसा है तो कहां पर भाजपा से चूक हुई है, इस बात की पड़ताल जरूरी है. आइए थोड़ा गुजरात के राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटते हैं. गुजरात के राजनीतिक इतिहास से यदि माधव सिंह सोलंकी का कार्यकाल हटा दिया जाए तो प्रदेश में कांग्रेस कभी मजबूत स्थिति में नहीं रही. चिमन भाई पटेल समाजवादी नेता थे. जानकार बताते हैं कि जब प्रदेश में भाजपा की स्थिति मजबूत होने लगी तो चिमन भाई ने कांग्रेस को साथ कर लिया. कांग्रेस को यह समझाया कि यदि कांग्रेस उनका साथ नहीं देगी तो प्रदेश में भाजपा आ जाएगी और फिर भाजपा को उखाड़ना आसान नहीं होगा. कांग्रेस चिमन भाई के साथ इसी डर के कारण गई. यानी चिमन भाई को भाजपा की बढ़ रही ताकत का अहसास हो चुका था, और हुआ भी वही. चिमन भाई के अवसान के साथ ही गुजरात में भाजपा का युग प्रारंभ हो गया और वह आजतक कायम है. 

केशूू भाई पटेल की भूमिका
कांग्रेस से सत्ता छीनने में केशू भाई पटेल की भूमिका को भाजपा नकार नहीं सकती है. केशू भाई न केवल पटेल थे अपितु वे ऐसे क्षेत्र से आते थे जिसका विलय गुजरात में किया गया था. आज भी राजकोट के पुराने लोग जब अहमदाबाद आते हैं तो कहते हैं कि मैं गुजरात जा रहा हूं. यानी सौराष्ट्र को गुजरात नहीं माना जाता था. हालांकि आज सौराष्ट्र में अलग राज्य की मांग थोड़ी कमजोर पड़ गई है, लेकिन सौराष्ट्र का शेष गुजरात के साथ अभी भी थोड़ा अंतरविरोध है. चूकि केशू भाई सौराष्ट्र के थे इसलिए सौराष्ट्र में भाजपा मजबूत होने लगी. इसका भाजपा को फायदा हुआ और भाजपा गुजरात में अभेद्य राजनीतिक किला बनाने में सफल रही. 

दरअसल, हर नेता का उत्थान और पतन होता है, लेकिन जिस प्रकार केशू भाई का पतन हुआ वह भाजपा के लिए बेहद खतरनाक था. केशू भाई के पतन के बाद संगठन के जोर और गुजराती टाइट हिन्दुत्व के एजेंडे के कारण ऊपर से भाजपा मजबूत तो दिखती रही, लेकिन अंदर ही अंदर भाजपा का ह्रास प्रारंभ हो गया. केशू भाई को संभालना चाहिए था लेकिन केशू भाई को नहीं संभाला गया, यह भाजपा की भयंकर चूक कही जा सकती है. उसी प्रकार कारण चाहें जो भी हों, लेकिन भारतीय जनता पार्टी राजपूत समाज के कद्दावर नेता बापू शंकर सिंह वाघेला को भी नहीं संभाल पाई.

क्यों लड़खड़ा रहा भाजपा का आत्मविश्वास?
गुजरात में दो समुदाय के वोटरों की संख्या सबसे ज्यादा है. एक तो पट्टिदार यानी पटेल हैं और दूसरा समुदाय एकिकृत राजपूतों का है. सारे राजपूत मिलकर लगभग 14 प्रतिशत तक हो जाते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में इन्हीं दो जातियों का आज भी दबदबा दिखता है. भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों ने इन दोनों दबंग जातियों को अपने से विमुख कर दिया, जबकि ये दोनों जातियां कांग्रेस से विमुख होकर भाजपा के पाले में आई थी, लेकिन इन दोनों जातियों को भाजपा से जो अपेक्षा थी वह तो पूरी नहीं ही हो सकी साथ ही भाजपा ने दोनों जातियों के कद्दावर नेताओं को भी ठेंगा दिखा दिया और उन नेताओं के स्थान पर डमी नेतृत्व खड़ा किया गया. आज की स्थिति यह है कि ये दोनों प्रभावशाली जातियां भाजपा के लिए चुनौती प्रस्तुत कर रहे हैं. भाजपा से यहां भयंकर चूक हुई है. 

गुजरात के विकास की कहानी
गुजरात में जहां तक विकास की बात है उससे सहमति रखी जा सकती है, लेकिन यह कहना कि शून्य या ऋणात्मक प्रगति से गुजरात को नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व ने उबारा, तो यह थोड़ा अटपटा-सा लगता है. गुजरात में औद्योगीकरण का विकास पहले प्रारंभ हो चुका था. नरेन्द्र मोदी पहले केशू भाई के समय में भी वहां कई प्रकार के विकास के काम हुए. गुजरात में आधारभूत संरचना का विकास कांग्रेस के शासन काल से प्रारंभ हो गया था. जब वित्तमंत्री सनत भाई मेहता हुए तो उन्होंने कई प्रभावशाली निर्णय लिए और उन निर्णयों के कारण मुंबई के इर्द-गिर्द जो कल-कारखाने क्षेत्रवाद की भेंट चढ़ रहे थे उनका पलायन गुजरात की ओर होने लगा. भावनगर, जामनगर, सूरत, अंकलेश्वर आदि औद्योगिक क्षेत्रों का विकास सनत भाई के नीतियों के कारण ही संभव हो सका.

मोदी का कार्यकाल और गुजरात
नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में उन नीतियों में भी व्यापक परिवर्तन किए गए. यह जानकर आश्चर्य होगा कि नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में प्रदेश की अधिकतर गोचर भूमि औद्योगिक घरानों के हाथों बेच दी गई. यह नरेंद्र मोदी के विकास का मॉडल था, जो कालांतर में भाजपा के खिलाफ गया. किसानों से जबरदस्ती भूमि लेकर औद्योगिक घरानों को बेचने की भी कई घटनाएं सामने आई है. यही नहीं नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में अलंग के सीप ब्रेकिंग उद्योग को भी जापानी कंपनी को 650 करोड़ रुपये में बेचने की योजना बनाई थी, लेकिन सीपब्रेकरों के व्यापक विरोध के बाद उस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, लेकिन वहां कुछ ऐसे प्रावधान कर दिए गए हैं कि आने वाले समय में सीप ब्रेकर खुद व खुद अलंग छोड़कर चले जाएंगे. हां कच्छ में नरेंद्र मोदी ने बेहद अच्छे काम किए, लेकिन उसका फायदा प्रदेश के लोगों को बहुत कम मिला बड़े व्यापारी आज भी मालामाल हो रहे हैं, इसलिए विकास के मानडंडों पर भी भाजपा के द्वारा चूक हुई है. 

कार्यकताओं की नाराजगी और भाजपा 
यहीं नहीं भाजपा जमीन स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को संभालने में नाकाम रही. केशू भाई के समय में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच समन्वय की बड़ी अच्छी और प्रभावशाली व्यवस्था खड़ी की गई थी. भाजपा के कार्यकर्ताओं में भी समन्वय के लिए तंत्र खड़ा किया गया था, लेकिन नरेंद्र मोदी ने उन तंत्रों को तोड़ दिया और खुद सारी व्यवस्थाओं को संचालित करने लगे.

नरेंद्र मोदी चूंकी आरएसएस के प्रचारक भी रहे और भाजपा के संगठनमंत्री भी, इसलिए उन्हें कार्यकर्ताओंकी ताकत और कमजोरी दोनों का पता था. नरेन्द्र भाई ने कार्यकर्ताओंकी कमजोरियों का फायदा खुद के लिए उठाया और उनकी ताकतों का उपयोग संगठन के लिए नहीं किया, इसलिए हजारों की संख्या में कार्यकर्ता भाजपा से टूट गए और आज वे जुड़कर भी भाजपा का हित नहीं कर सकते क्योंकि उन्होंने अपनी ताकत खो दी है. यकीनन भाजपा से यहां भी चूक हुई है. 

जीत और हार यह तो पार्टी है होती रहेगी, लेकिन गुजरात में भाजपा के पतन की आहट सुनाई देने लगी है. यह चुनाव इस दृष्टि से भी थोड़ा अलग सा दिख रहा है. 

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गौतम चौधरी

वरिष्ठ पत्रकार

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