बावरे मन में उदासी और निराशा के बीच भी छिपी है रौशनी, ऊबे नहीं लाइफ को भरपूर जिएं..!

मनुष्य का मन अक्सर मौजूदा स्थिति पर निर्भर करता है, जैसी स्थिति रहेगी वैसा मन रहेगा.
मनुष्य का मन अक्सर मौजूदा स्थिति पर निर्भर करता है, जैसी स्थिति रहेगी वैसा मन रहेगा.

किस दिशा में लगाना चाहिए मन को
किशोर या किशोरी का मन स्वमोहित होता है जबकि जवान एक दूसरे के प्रति अट्रैक्ट होते हैं. लड़का हो तो वह लड़की और लड़की हो तो वह लड़को को लेकर सोचती रहती है. उसके ख्यालों में ही डूबा रहती है और इस प्रकार समय जल्दी-जल्दी व्यतीत हो जाता है, लेकिन यदि शादी हो जाए तो 10 से 12 साल बाद गृहस्थी की गाड़ी खींचते हुए कितने ही स्त्री-पुरूष इस स्थिति में आ जाते हैं कि उन्हें जिन्दगी उबाऊ लगने लगती है. कहीं भी मन नहीं लगता. वृद्ध तो इस परिस्थिति से जूझते ही हैं अपितु भले चंगे व्यक्ति जो रिटायर्ड हो जाते हैं, वे भी मन न लगने वाली मानसिकता से संतृप्त रहते हैं.

मन नहीं लगने के कारण हैं,

1. करने को कुछ काम न सूझना
2. बार-बार एक जैसा काम करते रहने से ऊब जाना
3. वस्तुओं की भरमार से मन भर जाना
4. अत्यधिक अभावों एवं बार-बार की असफलताओं से निराशा उत्पन्न होना
5. अत्यन्त प्रिय व्यक्ति द्वारा धोखा देना
6. दुश्मनों का अधिक शक्तिशाली होना तथा बार-बार धमकाना, नुक्सान पहुंचाते रहना
7. संसार असार प्रतीत होना अथवा वैराग्य जागृत होना

मन नहीं लगने पर व्यक्ति उदास रहने लगता है. उसका समय व्यतीत ही नहीं होता.
मन नहीं लगने पर व्यक्ति उदास रहने लगता है. उसका समय व्यतीत ही नहीं होता.

मन नहीं लगने पर व्यक्ति उदास रहने लगता है. उसका समय व्यतीत ही नहीं होता. दिन पहाड़ सा लगने लगता है. जुआ खेलने और दूसरों की निंदा करने में भी मन नहीं लगे तो साधारण आदमी के लिए मन लगाने का कोई साधन नजर नहीं आता.

पुस्तकें हैं जीवन का असली साथी
मन बुरी बातों और बुरी चीजों में न ही लगे तो अच्छा. व्यक्ति अगर पढ़ा-लिखा है तो उसे पुस्तकों में मन लगाने का प्रयास करना चाहिए. पुस्तकें व्यक्ति का अकेलापन तो दूर करती ही हैं, वे सच्ची पथ प्रदर्शक भी बनती हैं. कहानियां, कविताएं, व्यंग्य, एकांकी, जीवनी, संस्मरण इनमें मन रमने पर जिन्दगी को नए सिरे से जीने की ललक पैदा हो जाती है.

पढ़ने के साथ-साथ अगर व्यक्ति लिखने भी लग गया तो समझिए कि उसकी तमाम निराशाएं समाप्त हो गई हैं. मौत (आत्महत्या) के कगार पर पहुंचे व्यक्ति को भी लेखनवृत्ति जीवनदान दे देती है. इसलिये तो कहा गया है कि जब कहीं भी शरण न मिले तो साहित्य की शरण में चले जाओ. यह आपको अमृतपान करायेगा. साहित्य सृजन सचमुच ’संजीवनी‘ का काम कर दिखाता है. यह जीवन के प्रति आस्था तो जगाता ही है, जीने की कला भी सिखाता है.

परिस्थितियों को समझने, उनमें सामंजस्य बिठाने अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों को बदलने की सूझ और शक्ति भी स्वाध्याय और लेखन से मिलती है. रचनात्मक प्रवृत्ति मानवीय अच्छाइयों को विकसित करती है. समाज को मनुष्य के जीने योग्य बनाती है. जब समाज मनुष्यों के जीने योग्य होता है तो भला क्यों नहीं किसी का मन लगेगा?     

सी.एल. सांखला       

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