कौन था महिषासुर? संसद में क्यों हुआ विवाद? हर सवाल का जवाब देती है ये किताब..!     

किताब : महिषासुर मिथक व परंपराएं. किताबों में कई लेखकों, पत्रकारों और शोधकर्ताओं के लेेेेख हैं.
किताब : महिषासुर मिथक व परंपराएं. किताबों में कई लेखकों, पत्रकारों और शोधकर्ताओं के लेेेेख हैं.

पिछले वर्ष 26 फरवरी को राज्यसभा में महिषासुर को लेकर खूब हंगामा हुआ था. तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने महिषासुर और दुर्गा के संबंध में जेएनयू के दलित व पिछड़े वर्ग के छात्रों द्वारा महिषासुर शहादत दिवस के मौके पर जारी पोस्टर को पढ़ा था. विपक्ष इस बात को लेकर नाराज था कि संसद में देवी दुर्गा के बारे में टिप्पणी क्यों की गई. दो दिनों तक इसी सवाल को लेकर संसद ठप्प भी रही. हाल ही में फॉरवर्ड प्रेस बुक्स की नई किताब ‘महिषासुर मिथक व परंपराएं’ महिषासुर पर प्रकाश डालती है. 

किसने लिखी है किताब 
प्रमोद रंजन द्वारा संपादित इस किताब के मुख पृष्ठ पर ही एक चित्र प्रकाशित की गई है, जिसमें बुंदेलखंड में कुलपहाड़ नामक तहसील के चौका में भैंसासुर का स्मारक है, जिसे भारत सरकार के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित किया गया है. साथ ही मोहारी गांव में मैकासुर का स्मारक स्थल भी है.

क्या लिखा है किताब में
अपनी किताब के बारे में संपादक प्रमोद रंजन ने स्वयं लिखा है कि असुर विमर्श के आधार पर खड़ा हुआ महिषासुर आंदोलन फुले, आंबेडकर और पेरियार के भारतीय सांस्कृतिक इतिहास को देखने के नजरिए को व्यापक बहुजन तबके तक ले जाना चाहता है, जिसमें आदिवासी, दलित, पिछड़े और महिलाएं शामिल हैं. इस सांस्कृतिक संघर्ष का केंद्रीय कार्यभार बहुजन के छिपे हुुुए एइतिहास को उजागर करना है. इसमें असुर, राक्षस और दैत्य ठहराए गए वास्तविक चरित्राेें को सामने लाना है.

जाहिर तौर पर पूरी किताब इसी केंद्रीय विषय पर आधारित है. किताब का सकारात्मक पक्ष यह है कि यह केवल पुरातात्विक प्रमाण नहीं देता है, बल्कि इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंत में जिंदा परंपराओं की गवाही भी प्रस्तुत करता है.

कुछ ऐसे हैं किताब में लेख
पहला खंड यात्रा वृतांत है. पहला लेख स्वयं प्रमोद रंजन ने लिखा है. ‘महोबा में महिषासुर’ शीर्षक लेख में लेखक स्वयं उन सवालों का जवाब तलाशते हैं जो सवाल 26 फरवरी 2016 को संसद में उठाए  गए थे और जिनका जवाब नहीं होने के कारण बहुजन समाज के सांसद भी प्रतिवाद नहीं कर सके थे. 
किताब में प्रमाण के लिए चित्र भी प्रकाशित किए गए हैं. लेख के जरिए यह बताया गया है कि महिषासुर लोक देवता के रूप में पूरे बुंदेलखंड में पूजे जाते हैं. कहीं मैकासुर तो कहीं भैंसासुर या कारसदेव के रूप में. मूर्तियों के बदले चबूतरा. कहीं-कहीं पिंडियां.

यहां रहते हैं असुर जाति के लोग
इसी किताब में ‘छोटानागपुर के असुर’ में लेखक नवल किशोर कुमार ने झारखंड के गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड के उन गांवों का चित्रण किया है, जहां असुर समुदाय के लोग रहते हैं. असुर जनजाति एक आदिम जनजाति है और अब विलुप्त होने के कगार पर है. इस लेख में असुर समुदाय के जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों को बताया गया है. 

महिषासुर को लेकर तथ्य
किताब में सबसे बड़ा लेख संजय जोठे का है. संजय जोठे इतिहास के ‘शोधकर्ता एवं लेखक हैं. अपने लेख गोंडी पुनेम दर्शन और महिषासुर’ में वह गोंड समुदाय द्वारा पूजे जाने वाले लोक देवताओं से जुड़े ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं. उनके मुताबिक गोंड समुदाय के आदिवासियों के लिए महिषासुर एक नायक हैं. उनके तथ्य आचार्य मोती रावण कंगाली के द्वारा किए गए शोधों पर आधारित हैं, जिन्होंने गोंडी भाषा और संस्कृति को परिभाषित किया. संपादक ने यह किताब आचार्य मोती रावण कंगाली और उनकी पत्नी तिरूमय चित्रलेखा कंगाली को समर्पित की है.

बहरहाल, ‘महिषासुर आंदोलन की सैद्धांतिकी- एक संरचनात्मक विश्लेषण’ के जरिए लेखक अनिल कुमार ने एक बड़ी लकीर खींची है,जो महिषासुर विमर्श को विस्तार देता है. यह किताब देश के बहुजनों को एक आधार भी उपलब्ध कराती है. 

किताब : महिषासुर मिथक व परंपराएं (लेख-संग्रह)
संपादक : प्रमोद रंजन
मूल्य : 250 रुपए (किंडल), 350 रुपए (पेपर बैक), 850 रुपए (हार्डबाऊंड)
पुस्तक सीरिज : फॉरवर्ड प्रेस बुक्स, नई दिल्ली
प्रकाशक व डिस्ट्रीब्यूटर : द मार्जिनलाइज्ड, वर्धा/दिल्ली, मो : +919968527911 (वीपीपी की सुविधा उपलब्ध)

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