जानलेवा है खून की कमी, जानें शरीर में एनीमिया के संकेत..!

जानलेवा है खून की कमी. (फोटो: pixabay.com)
जानलेवा है खून की कमी. (फोटो: pixabay.com)

एक सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश में 60 प्रतिशत लोगों में रक्त की कमी है. इस रोग से 40 प्रतिशत लड़कियां प्रभावित हैं तथा प्रभावित गर्भवती महिलाओं का प्रतिशत तो अस्सी है. इसके साथ ही सर्वेक्षण यह भी दर्शाता है कि 25 से 44 वर्ष के आयु वर्ग में 64 प्रतिशत महिलाओं तथा 50 प्रतिशत पुरुषों में यह बीमारी पायी जाती है. स्पष्ट है कि इस रोग की पकड़ में महिलाएंं अधिक हैं.

रक्त की कमी का यह रोग रक्ताल्पता या अनीमिया के नाम से जाना जाता है. यह हमारे शरीर में लौह युक्त प्रोटीन अर्थात हीमोग्लोबिन की कमी का सूचक है. हीमोग्लोबिन ही वह तत्व है जिससे रक्त कोशिकाओं का रंग-लाल होता है और रक्त का ऑक्सीजन युक्त होना भी उसी पर निर्भर करता है.

यह बीमारी महिलाओं में अधिक इसलिए पायी जाती है क्योंकि भारतीय समाज में लड़कियों की परवरिश पर उचित ध्यान न दिये जाने के कारण उनका पोषण अपर्याप्त रहता है. लड़कियों के कुपोषण की इस स्थिति का आकलन राष्ट्रीय पोषण मॉनीटरिंग ब्यूरो की वह रिपोर्ट भी करती है जिसमें कहा गया है कि 13 से 15 वर्ष की लड़कियों को इस देश में 1620 कैलोरी वाला भोजन ही मिलता है जबकि उन्हें कम से कम 2050 कैलोरी भोजन चाहिए. अतः लड़कियों में रक्त की कमी तो कुपोषण के कारण पहले से ही रहती है तथा यह कमी गर्भाधान और प्रसव के समय के बीच अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाती है. इस कारण से यह बीमारी महिलाओं में अधिक पायी जाती है.

एक सामान्य पुरुष की अपेक्षा एक सामान्य महिला को दुगने लौह तत्व की आवश्यकता होती है. इसके अलावा गर्भावस्था के समय तथा स्तनपान करवाने के समय में उनके शरीर में लौह तत्व की मांग और भी बढ़ जाती है.

इसके अलावा प्रौढ़ावस्था अर्थात 40 से 50 की आयु के बीच में कुछ महिलाओं का मासिक स्राव इतना अनियमित होता है कि वह 15 दिन से लेकर दो महीने तक भी लगातार चलता रहता है. ऐसी परिस्थिति में उन महिलाओं के शरीर में रक्त की असाधारण कमी हो जाती है.

हालांकि कोई व्यक्ति अनीमिया का मरीज है या नहीं, इसका पता तो तभी चल सकता है जब संभावित व्यक्ति के रक्त की जांच हो, फिर भी, कुछ लक्षणों के आधार पर रोगी व्यक्ति की पहचान की जा सकती है.

इस बीमारी का मरीज थोड़े काम में थक जाता है. उसे उठने बैठने और खड़े होने में चक्कर आते हैं. उसे कई बार ऐसा भी लगता है कि दम फूल रहा है या सांस रूक रही है. रोगी का जीवन के प्रति उत्साह कम हो जाता हैं वह चिड़चिड़ा हो जाता है, उसकी आंखें निस्तेज हो जाती हैं तथा उसकी खुराक भी कम हो जाती है. रोगी के शरीर व सिर में दर्द रहता है. हाथ पैर सुन्न हो जाते हैं या फिर उनमें सूजन आ जाती है.

खून की कमी आंख की रोशनी को भी प्रभावित करती है और आंख की श्लेष्मा वाली झिल्ली का रंग हल्का हो जाता है. इस मर्ज के रोगियों को नींद भी कम आती है. इस रोग के लक्षण रोगी की त्वचा पर भी देखे जा सकते हैं. त्वचा अपना स्वाभाविक रंग खोकर पीली सी नजर आने लगती है. मसूड़े तथा होंठ भी पीले हो जाते हैं. नाखूनों का रंग भी बदल जाता है. वे टूटने भी लगते हैं.

व्यक्ति को अनीमिया है या नहीं, इसका पता लगाने के लिए हीमोग्लोबिन की जांच की जाती है, हेमाटोक्रिट की सान्द्रता का पता लगाया जाता है और साथ ही रक्त में रक्त कोशिकाओं की संख्या का पता भी लगाया जाता है. जांच में इन तीनों चीजों का स्तर औसत में कम निकलने पर मान लिया जाता है कि व्यक्ति अनीमिया का शिकार है.

रक्त की कमी का प्रमुख कारण किसी दुर्घटना या चोट के कारण शरीर से रक्त का बह जाना भी है. इसके अलावा रक्त की अशुद्धता तथा कोशिकाओं के नष्ट होने की गति की तीव्रता से भी अनीमिया हो सकता है. पेट के कीड़े, खूनी बवासीर और नकसीर के कारण भी अनीमिया हो जाता है. यह इसलिए क्योंकि नकसीर तथा बवासीर से खून बह जाता है तथा पेट के कीड़े खून चूसते हैं. अनीमिया को साधारणतया लोग बड़ी बीमारी नहीं मानते. लोगों की यह धारणा गलत है क्योंकि यह बीमारी जानलेवा भी साबित हो सकती है. विशेषकर गर्भवती महिला अगर इस बीमारी का शिकार है तो उसका शिशु मृत पैदा हो सकता है और यदि प्रसवकाल में ज्यादा रक्तस्राव हो जाएं तो फिर महिला को बचा पाना भी असंभव है.

इस बीमारी की रोकथाम के लिए सरकार ने सरकारी अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, बालवाडि़यों तथा परिवार कल्याण केंद्रों के माध्यम से प्रभावी उपाय किये हैं. इन केन्द्रों पर फोलिक ऐसिड तथा लौह तत्व की गोलियां निशुल्क वितरित की जाती हैं. साथ ही इस रोग से बचाव के लिए हमें भी उन कारणों की रोकथाम करनी होगी जो इसके फैलने के लिए जिम्मेदार हैं.

मसलन, यदि हम अपने हाथ, नाखून और मुंह की सफाई का विशेष ध्यान रखें तो पेट के कीड़ों से बचे रहेंगे. साथ ही अधिक रक्तस्राव वाली बीमारी नकसीर, खूनी बवासीर और अनियमित मासिक चक्र का इलाज भी कुशल चिकित्सक से करायें. इस बीमारी के रोगी को दवाओं के अलावा लौह तत्व की पूर्ति करने वाला भोजन जैसे गाजर, टमाटर, पत्तागोभी व हरी पत्तेदार सब्जियों का खूब प्रयोग करना चाहिए.

लोहे की कड़ाही में बनी सब्जियां खाना अति उत्तम होता है. इसके अलावा मूंग, तिल, बाजरा आदि अनाजों का प्रयोग और आम, चीकू, केला, पपीता, नाशपाती, सेब आदि फलों का सेवन भी करना चाहिए. साथ ही हम यह भी ध्यान रखें कि रक्त के निर्माण में लौह तत्व के अलावा विटामिन्स, प्रोटीन तथा खनिजों की भी आवश्यकता होती है. अतः हमारे भोजन में यह तत्व भी पर्याप्त हों हम तभी अनीमिया से बच सकते हैं.

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