कैसे बना रामसेतु और क्या है रहस्य? विज्ञान की जांच से बाहर आया 7 हजार साल पुराना एक सच..!

पुरातत्वविद चेल्सी रोज और वैज्ञानिक ऐलन लेस्टर का दावा है कि ये करीब सात हजार वर्ष पुरानी हैं जबकि इन पर मौजूद पत्थर करीब चार-पांच हजार वर्ष पुराने हैं. (फोटो : YouTube पर साइंस चैनल के प्रोग्राम ‘What on Earth’ का स्क्रीन शॉट.)
पुरातत्वविद चेल्सी रोज और वैज्ञानिक ऐलन लेस्टर का दावा है कि ये करीब सात हजार वर्ष पुरानी हैं जबकि इन पर मौजूद पत्थर करीब चार-पांच हजार वर्ष पुराने हैं. (फोटो : YouTube पर साइंस चैनल के प्रोग्राम ‘What on Earth’ का स्क्रीन शॉट.)

रामायण में जिस रामसेतु का वर्णन है, उस पर अमेरिकी वैज्ञानिकों ने प्रमाणिकता की मोहर लगा दी है. अमेरिका के साइंस चैनल ने भू-गर्भ वैज्ञानिकों, पुरातत्वविदों की अध्ययन रिपोर्ट के आधार पर कहा है कि भारत और श्रीलंका के बीच रामसेतु के जो संकेत मिलते हैं, वो मानव निर्मित है. सैटेलाइट पिक्चर्स की स्टडी के बाद कहा गया है कि भारत-श्रीलंका के बीच 30 मील के क्षेत्र में बालू की चट्टानें पूरी तरह से प्राकृतिक हैं, लेकिन उन पर रखे गए पत्थर कहीं और से लाए गए प्रतीत होते हैं. पुरातत्वविद चेल्सी रोज और वैज्ञानिक ऐलन लेस्टर का दावा है कि ये करीब सात हजार वर्ष पुरानी हैं जबकि इन पर मौजूद पत्थर करीब चार-पांच हजार वर्ष पुराने हैं.

कहां स्थिति है रामसेतु
रामायण के मुताबिक भारत के दक्षिणपूर्व में रामेश्वरम और श्रीलंका के पूर्वोत्तर में मन्नार द्वीप के बीच उथली चट्टानों की एक श्रृंखला है. इस इलाके में समुद्र बेहद उथल है. समुद्र में इन चट्टानों की गहराई सिर्फ 3 फुट से लेकर 30 फुट के बीच है. इसे भारत में पहले नलसेतु, बाद में रामसेतु व दुनिया में आदम सेतु के नाम से जाना जाता है. इसकी लंबाई लगभग 48 किलोमीटर है.

इन दस्तावेजों में भी है जिक्र
ब्रिटिश सरकार के 132 वर्ष पुराने दस्तावेज (मैनुअल ऑफ दी एडमिनिस्ट्रेशन आफ दी मद्रास प्रेसीडेंसी-संस्करण 2 के पृष्ठ क्रमांक 158) के विवरण बताते हैं कि कुछ साल पहले तक समुद्र का यह हिस्सा उथला था और लोग इसे पैदल चलकर ही पार कर लिया करते थे. जब इसका निर्माण किया गया होगा तो यह समुद्र के ऊपर ही रहा होगा और जैसे-जैसे मौसम में परिवर्तन होता गया और समुद्रतल बढ़ा तो रामसेतु के बहुत बड़े हिस्से भी इसमें डूब गए.

वाल्मीकि रामायण के अलावा कवि कालिदास की रचना रघुवंश पुराणों में स्कंद पुराण, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण और ब्रह्म पुराण में भी श्रीराम के सेतु का वर्णन किया गया है. (फोटो साभार : travelplanet.in).
वाल्मीकि रामायण के अलावा कवि कालिदास की रचना रघुवंश पुराणों में स्कंद पुराण, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण और ब्रह्म पुराण में भी श्रीराम के सेतु का वर्णन किया गया है. (फोटो साभार : travelplanet.in).

प्रामाणिकता पर विवाद
वैसे रामसेतु की प्रमाणिकता का यह कोई पहला उदाहरण नहीं है. भगवान श्रीराम के समकालीन रहे महर्षि वाल्मीकि जी अपनी अमर रचना रामायण में लिखते हैं कि रामसेतु का निर्माण वानर सेना में मौजूद नल और नील ने किया था. गोस्वामी तुलसीदास श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड में लिखते हैं –
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई. लरिकाईं रिषि आसिष पाई
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे. तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे

राम के क्रोध से भयभीत समुद्र ने कहा हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं. उन्होंने लड़कपन में ऋषि से आशीर्वाद पाया था कि उनके स्पर्श कर लेने से ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जाएंगे. नल और नील के पिता भी सेतु बांधने की कला में पारंगत थे. नल और नील की मदद से पहले दिन 14 योजन पुल बांधा गया, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन चौथे दिन 22 योजन और पांचवें दिन 23 योजन पुल बांध दिया गया. वाल्मीकि रामायण में यह भी लिखा है कि ये पुल 10 योजन चौड़ा था.वाल्मीकि रामायण के अलावा कवि कालिदास की रचना रघुवंश पुराणों में स्कंद पुराण, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण और ब्रह्म पुराण में भी श्रीराम के सेतु का वर्णन किया गया है लेकिन इतने प्रमाण होने के बावजूद भी नकारवादी बार-बार रामसेतु के बहाने रामायण व श्रीराम की ऐतिहासिकता के बारे में भ्रम फैलाते रहे.

क्या स्थिति थी अंग्रेजों के समय
अंग्रेजों के समय भारत और श्रीलंका के बीच व्यापारिक मार्ग को छोटा करने के लिए सेतु समुद्रम योजना बनाई गई, लेकिन बिना राम सेतु को तोड़े इस योजना को पूरा करना मुश्किल था. वर्ष 1860 के आसपास एक ब्रिटिश नौसैनिक कमांडर ने यह प्रस्ताव रखा था, लेकिन इस पर पहली बार गंभीरता से विचार हुआ वर्ष 1955 में लेकिन यह परियोजना लटकती रही. वर्ष 2004 में जब संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा की सरकार बनी तो इस योजना को फिर फाइलों से बाहर निकाला गया. ज्ञातव्य हो कि संप्रग में शामिल बहुत से दलों का चरित्र सदैव बहुसंख्यकों के प्रति संदिग्ध रहा है.

अंग्रेजों द्वारा बांटो और राज करो की नीयत से तैयार किया गया आर्य-द्रविड़ नामक कपोल कल्पित सिद्धांत द्रविड़ मुनेत्राम कड़गम (डीएमके) का राजनीतिक एजेंडा रहा है. अंग्रेजों ने यह विभाजनकारी सिद्धांत इसलिए तैयार किया ताकि द्रविड़ों को भारत का मूल निवासी बता कर आर्यों को आक्रमणकारी साबित किया जा सके. इससे अंग्रेजों को यहां शासन करना इस आधार पर निर्बाध हो जाए कि जब आर्य (हिंदू) बाहर से आकर भारत पर शासन कर सकते हैं, तो बर्तानिया के लोग क्यों नहीं?

अमेरिकी चैनल ने वैज्ञानिक रूप से यह साबित कर दिया है कि रामसेतु मानव निर्मित है. (फोटो : Nasa Image gallery).
अमेरिकी चैनल ने वैज्ञानिक रूप से यह साबित कर दिया है कि रामसेतु मानव निर्मित है. (फोटो : Nasa Image gallery).

क्या हुआ कांग्रेस काल में
मनमोहन सिंह की सरकार ने साल 2005 में इस परियोजना को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हरी झंडी दी, लेकिन भाजपा ने इस परियोजना का यह कहते हुए विरोध किया कि रामसेतु को छेड़े बिना परियोजना के वैकल्पिक मार्गों पर विचार होना चाहिए. भाजपा ने इस विरोध के पीछे केवल करोड़ों नागरिकों की धार्मिक भावनाएं ही नहीं बल्कि सामरिक, पर्यावरण, स्थानीय मछुआरों की रोजी-रोटी व आर्थिक कारण भी गिनवाए.

सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका
भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने इसके खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की. बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. इस पर तत्कालीन मनमोहन सिंह की सरकार ने वर्ष 2007 में सुप्रीम कोर्ट में एक शपथपत्र दाखिल किया जिसमें लिखा गया कि यह एक मानव निर्मित ढांचा नहीं है. विरोध होने पर संशोधित शपथपत्र पेश किया गया जिसमें लगभग इसी तरह की बात कही गई कि इसके कोई प्रमाण नहीं है कि राम कोई ऐतिहासिक पात्र थे और यह ढांचा प्राकृतिक रूप से बना हुआ है, लेकिन अब अमेरिकी चैनल ने वैज्ञानिक रूप से यह साबित कर दिया है कि रामसेतु मानव निर्मित है अर्थात इस खोज से कहीं न कहीं रामायण की ऐतिहासिकता पर मुहर लग गई है.

(इस लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं. India-reviews.com इसमें उल्लेखित बातों का न तो समर्थन करता है और न ही इसके पक्ष या विपक्ष में अपनी सहमति जाहिर करता है. यहां प्रकाशित होने वाले लेख और प्रकाशित व प्रसारित अन्य सामग्री से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. आप भी अपने विचार या प्रतिक्रिया हमें editorindiareviews@gmail.com पर भेज सकते हैं.)

राकेश सेन

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