इंडिया की तस्वीर बदल सकता है इजराइल का ये शानदार सिस्टम

Agriculture and Medical System of Israel and India. Image Source: Pixabay.com
(इंजराइल का इंफ्रास्ट्रक्चर फोटो : Pixabay.com)

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इजरायल की यात्रा पर जा रहे हैं. इजरायल के साथ हमारे संबंध हिचकोले खाते रहे हैं. जब पूरी दुनिया शीतयुद्ध की चपेट में थी, उस समय हमारा कूटनीतिक झुकाव सोवियत रूस की ओर था. चूंकी इजरायल अमेरिकी कैम्प में था, इसलिए हमारे कूटनीतिज्ञ इजरायल की ओर देखने से भी कतराते थे.

खैर, दुनिया बदली और शक्ति का संतुलन भी बदल गया. भारत को भी बदलना पड़ा. अब हम आधुनिक युग में जी रहे हैं. निःसंदेह इन दिनों हमारा कूटनीतिक झुकाव संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर है, लेकिन हमें संतुलन बनाने की जरूरत है. इस संतुलन में इजरायल हमारा बेहद करीबी मित्र साबित हो सकता है. हालांकि इजरायल के साथ प्रगाढ़ता के खतरे भी बहुत हैं, लेकिन भारत के लिए अरब और इजरायल के बीच संतुलन बना कर रखना बेहद जरूरी है.

सन् 1947 में भारत आजाद हो गया और लगभग उसी समय आधुनिक इजरायल भी अस्तित्व में आया. यदि ऐसा कहा जाए कि एक ही वर्ष सन् 1947 में दुनिया का दो पुरातन राष्ट्र स्वतंत्र और आधुनिक आकार ग्रहण किया तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. भारत और इजरायल लगभग साथ में दुनिया के नक्शे पर उभरे. कायदे से दोनों दोनों देशों को तुरंत दोस्त बन जाना चाहिए था, क्योंकि दोनों की परिस्थितियां लगभग एक जैसी थीं, पर दोनों में इसे लेकर बहुत दिनों तक हिचक रही. यह दोस्ती बहुत दिनों तक बन नहीं पाई.

हालांकि भारत के कई नेताओं ने प्रयास किया पर बात नहीं बनी. जब सोवियत टूटा तो भारत इस दिशा में बड़ी तेजी से पहल करना प्रारंभ किया. गोया 1992 में हिंदुस्तान ने इजरायल की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया. उस बात को 25 साल होने को हैं और इस मौके को यादगार बनाने के लिए भारत के इतिहास में पहली बार कोई प्रधानमंत्री आधिकारिक तौर पर इजरायल की यात्रा कर रहा है. इजरायल भी प्रधानमंत्री मोदी की आगवानी के लिए पलक-पांवड़े बिछाया-सा प्रतीत होता है.

दरअसल, चारों तरफ से दुश्मनों से घिरे इस छोटे से देश ने अपनी मेहनत से ऐसा बहुत कुछ हासिल किया है, जो हमारे लिए मिसाल की तरह है. उसे हमें सीखना होगा. यदि हम सचमुच सामरिक दृष्टि से दुनिया में अपनी पहचान बनाने के लिए प्रयासरत हैं, तो इजरायल और जापान के साथ हमारी दोस्ती प्रगाढ होनी चाहिए.

इजरायल ने अपने यहां क्या-क्या किया है, जिसे हमें सीखने की जरूरत है तो उसमें सबसे महत्वपूर्ण है भाषा. हमारे यहां 22 बड़ी भाषाएं हैं. बोलियां गिनें तो संख्या 1635 है. हमारी भाषा दिन ब दिन कमजोर होती जा रही है, लेकिन इजरायल ने अपनी भाषा को बचाकर रखने में बड़ी भूमिका निभाई है. हमें यह उससे सीखना होगा.

20वीं सदी की शुरुआत में हिब्रू यहूदियों के धर्मग्रंथों में सिमट चुकी थी. वैसे ही जैसे आज हमारे यहां संस्कृत हिंदुओं के धर्मग्रंथों तक सीमित है, लेकिन जब यूरोप के अलग-अलग हिस्सों से यहूदी अपना नया मुल्क बसाने फिलिस्तीन आकर बसने लगे तो पूरे देश को बांधने के लिए एक नई भाषा की जरूरत महसूस हुई. हिब्रू को उन्होंने देश की भाषा बना दिया और आज इजरायल हिब्रू बोलने वाला मुल्क है.

हमें यहूदियों से खेती की आधुनिक तकनीक भी सीखना होगा. हमारे किसान आज बेहाल हैं, लेकिन इजरायल छोटा सा देश है. यहां सिर्फ 20 प्रतिशत जमीन पर ही खेती हो सकती है, बावजूद इसके इजरायल खेती के मामले में दुनिया में सबसे अव्वल देशों में गिना जाता है. प्रकृति की चुनौतियों को इजरायल ने तकनीक से जवाब दिया है. यहां खेती में इस्तेमाल होने वाली टेक्नॉलॉजी दुनिया में सबसे उन्नत है. इजरायल में सिर्फ पौने चार फीसदी लोग खेती करते हैं, लेकिन वो अपने देश की जरूरत का 95 फीसदी खाना उगा लेते हैं, साथ ही ढेर सारा माल दुनिया के देशों में बेच भी देता है. इजरायल के अनुभवों से हम काफी कुछ सीख सकते हैं.

इजरायल दुनिया भर से आकर बसे लोगों का देश है, तो दुनिया भर में उनके सगे संबंधी रहते हैं. इस एक चीज का एक भी फायदा इजरायल उठाने से नहीं चूकता. वहां की सरकार जहां गुंजाइश हो इजरायल कनेक्शन ढूंढ लेती है और उसे अच्छी तरह भुनाती है. अमेरिकी इंडस्ट्री और मनोरंजन उद्योग में यहूदियों की तगड़ी पकड़ है. लाजमी तौर पर वे इजरायल से सहानुभूति रखते हैं. अमेरिकी इंडस्ट्री से इजरायल को पूरी मदद मिलती है और हॉलिवुड के जरिए इजरायल का नजरिया दुनिया भर में गूंजता रहता है. हमें इजरायल से यह भी सीखनी चाहिए.

इजरायल चारों तरफ से दुश्मन देशों से घिरा है. जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और मिस्र के साथ-साथ सभी अरब देश कुछ अंदर तो कुछ बाहर से इजरायल के खिलाफ रार पाले हुए हैं. यही नहीं समय-समय पर हमला करने से भी नहीं चूकते हैं. इनके अलावा गाजा और वेस्ट बैंक से हमास और फतेह के उग्रवादी भी इजरायल के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं, बावजूद इसके इजरायल आंतरिक और बाहरी दोनों तरह से काफी सुरक्षित है. छोटी-मोटी घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन लंबे समय से कोई बड़ा हमला नहीं हुआ है.

यकीनन, भारत इस मामले में इजरायल से दो सबक सीख सकता है- पहला इजरायल की तरह इंटेलिजेंस इकट्ठा करना और उस पर समय रहते अमल करना-दूसरा अपने पास मौजूद तकनीक का भरपूर इस्तेमाल करना.

इजरायल की सरकार अपने नागरिकों का बड़ा ध्यान रखती है. यहां के सोशल सिक्योरिटी सिस्टम में एक शख्स की पढ़ाई से लेकर उन्हें काम देकर सेटल करने तक ध्यान रखा जाता है. कोई बीमार पड़े तो दुनिया का बेहतरीन हेल्थ केयर सिस्टम तुरंत हरकत में आ जाता है. इजरायल के पास प्राकृतिक संसाधनों की बेहद कमी है, लेकिन वह अपनी जनता को ही संसाधन के रूप में विकसित कर देती है. यदि हम भी अपनी जनसंख्या को बतौर संसाधन उपयोग करें तो हमारा कायाकल्प हो सकता है. इसलिए कई मामलों में इजरायल हमारा स्वाभाविक मित्र साबित हो सकता है.

सामरिक दृष्टि से भी इजरायल हमारे लिए बेहद उपयोगी है. जिस प्रकार भारत दुश्मनों से घिरा हुआ देश है उसी प्रकार इजरायल भी दुश्मनों से घिरा हुआ देश है. इजरायल इस मामले में भारत का सहयोग कर सकता है. हमें एक ओर चीन जैसे बड़े देश से सीमा पर चुनौती मिल रही है तो दूसरी ओर पाकिस्तान हमारे खिलाफ मोर्चा खोले हुए है. पाकिस्तान और चीन दोनों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस दोनों का समर्थन है. ऐसे में इजरायल के माध्यम से हम अपनी पकड़ मजबूत कर सकते हैं.

इजरायल हमें तकनीक, गुप्तचर, सामरिक आदि कई प्रकार की सहायता प्रदान कर सकता है. साथ ही अमेरिका पर दबाव भी बना सकता है. यदि इजरायल के साथ ठीक-ठीक दोस्ती फिट बैठ जाती है तो वह रूस पर भी दबाव बना सकता है. सामरिक भूगोल में इजरायल को भी एक दमदार एशियायी पाटनर चाहिए. उसकी जरूरत भारत पूरा कर सकता है, लेकिन भारत को यह देखना होगा कि इजरायल के चक्कर में अरब और इरान के साथ संबंध न बिगड़ जाए. ऐसे में संतुलन बिठाना जरूरी है. प्रधानमंत्री का इजरायल प्रवास कई संभावनाओं का द्वार खोल सकता है. यदि सही पहल हुआ तो भारत और इजरायल दुनिया के लिए शांति और सद्भाव का मार्ग भी प्रशस्थ करेगा.

गौतम चौधरी

वरिष्ठ पत्रकार

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